
राजनांदगांव : पॉली हाउस के बिना मल्चिंग और ड्रिप सिस्टम से स्ट्रॉबेरी की खेती…
राजनांदगांव , पंडित किशोरी लाल शुक्ला उद्यानिकी कॉलेज एवं अनुसंधान केन्द्र में स्ट्राबेरी की खेती पर अनुसंधान किया जा रहा है। मूलतः स्ट्राबेरी की खेती ठंडी जलवायु वाले स्थानों में की जाती रही है। गर्म प्रदेशों को इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं माना गया है। लेकिन राजनांदगांव जिला जो कि छत्तीसगढ़ के मैदानी क्षेत्र में है और यहां पर स्ट्राबेरी की खेती की संभावना को देख शोध किया जा रहा है। महाविद्यालय फार्म में महाबलेश्वर, महाराष्ट्र से मंगाई गई स्ट्राबेरी के दो किस्मों विंटर डॉन एवं स्वीट सेंसेसन की खेती की जा रहा है।
स्ट्राबेरी की खेती मुख्य रूप से पॉलीहाउस और संरक्षित संरचनाओं के अंदर ही की जाती रही है। लेकिन कॉलेज फार्म में इसकी खेती खुले आसमान के नीचे मलचिंग और ड्रिप सिंचाई सिस्टम से की जा रही है। शोध के रूप में विभिन्न सूक्ष्म पोषक तत्वों एवं पादप हॉर्मोन्स के छिड़काव का स्ट्राबेरी के पुष्पन, फलन, उपज एवं फलों की गुणवत्ता पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन भी किया जा रहा है। अभी व्यावसायिक स्तर पर इसका उत्पादन नहीं किया जा रहा। लेकिन इसकी खेती में करीब दर्जनभर से ज्यादा मजदूरों को तीन माह तक रोजगार दिया गया।
औसत 25 से 30 ग्राम, अधिकतम वजन 52 ग्राम तक भी मिला स्ट्राबेरी की दो किस्मों के पौधे महाबलेश्वर, महाराष्ट्र से मंगाए गये थे। मिट्टी प्रबंधन कर अच्छे से तैयार खेतों में मलचिंग के साथ रोपा गया था। रोपाई के लगभग 45 दिनों के बाद ही पौधों में पुष्पन और फलन शुरू हो गया। इसमें वानस्पतिक विकास अच्छी रही और फल अधिक संख्या में तथा बड़े आकार में प्राप्त हो रहे हैं। इनमें फलों का औसत वजन 25 से 30 ग्राम तक आसानी से मिल रहा है। बड़े आकार के फल मिल रहे हैं।


